डॉ. रवीन्द्र कुमार सैनी सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य एवं निदेशक, राष्ट्रीय चरित्र निर्माण अभियान, देहरादून की कलम से

विकासनगर। जीवन के विस्तृत आकाश में कुछ व्यक्तित्व नक्षत्रों की भाँति उदित होते हैं। उनका प्रकाश केवल उनके पद की सीमाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि असंख्य हृदयों के भीतर उतरकर वहाँ एक स्थायी दीपशिखा प्रज्वलित कर देता है। समय अपनी गति से आगे बढ़ जाता है, पद बदल जाते हैं, दायित्व समाप्त हो जाते हैं, लेकिन ऐसे व्यक्तित्वों की स्मृतियाँ समय की सीमाओं को लाँघकर मनुष्य की चेतना में युगों तक जीवित रहती हैं।

लेफ्टिनेंट जनरल श्री गुरमीत सिंह जी ऐसा ही एक विराट व्यक्तित्व हैं। राज्यपाल का पद उनकी पहचान अवश्य रहा, लेकिन उनकी वास्तविक पहचान उनकी संवेदनशीलता, सरलता, विनम्रता, आत्मीयता और मानवीय गरिमा रही। वे पद से बड़े थे, क्योंकि पद मनुष्य को अधिकार देता है, पर मनुष्य पद को अर्थ देता है। महामहिम ने अपने आचरण से राज्यपाल पद को मानवीय गरिमा का नया अर्थ दिया।

एक सम्मान, जिसने जीवन की अविस्मरणीय यात्रा का द्वार खोला

5 सितंबर 2022 का दिन मेरे जीवन की स्मृतियों में सदैव एक स्वर्णिम पृष्ठ के रूप में सुरक्षित रहेगा। शिक्षक दिवस के अवसर पर मुझे प्रथम बार उत्तराखंड के राज्यपाल के रूप में लेफ्टिनेंट जनरल श्री गुरमीत सिंह जी के हाथों शैलेश मटियानी पुरस्कार से सम्मानित होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

मंच पर वह क्षण कुछ ही सेकंड का था। पुरस्कार प्राप्त करना गौरव का विषय था, लेकिन उससे भी अधिक अविस्मरणीय वह आत्मीय व्यवहार था, जो उन्होंने बधाई देते समय प्रदर्शित किया। कभी-कभी जीवन में कुछ क्षण बहुत छोटे होते हैं, लेकिन उनका प्रभाव वर्षों तक बना रहता है। कुछ शब्द कानों से होकर नहीं, सीधे हृदय में प्रवेश करते हैं।

मेरे भीतर कविता के माध्यम से भाव व्यक्त करने की सहज प्रवृत्ति थी। मैंने महामहिम के नाम के प्रत्येक अक्षर को आधार बनाकर अंग्रेजी में एक कविता लिखी। उसे सुंदर फ्रेम में तैयार करवाकर राजभवन कार्यालय में जमा कर दिया। मन में कोई अपेक्षा नहीं थी। मुझे लगा कि वह कविता उन तक पहुँचेगी भी या नहीं।

लेकिन जीवन के सुंदरतम अध्याय तब आरंभ होते हैं, जब मनुष्य प्रतिफल की अपेक्षा किए बिना अपने हृदय की बात कहता है। लगभग एक सप्ताह बाद राजभवन से फोन आया कि महामहिम मुझसे भेंट करना चाहते हैं।

जब राजभवन में एक साधारण शिक्षक को मिला असाधारण आत्मीयता का सम्मान

मैं प्रसन्नता और उत्सुकता से राजभवन पहुँचा। अनुमान था कि व्यस्त राज्यपाल से एक-दो मिनट मिल जाना भी पर्याप्त होगा। लेकिन वहाँ जो हुआ, उसने मेरी सारी धारणाएँ बदल दीं।

महामहिम ने मुझे एक-दो मिनट नहीं, बल्कि एक घंटे से भी अधिक समय दिया। चाय-नाश्ते के दौरान उन्होंने उत्तराखंड से जुड़े अनेक विषयों पर संवाद किया। मैं एक साधारण शिक्षक था, पर उनके व्यवहार में कहीं आभास नहीं हुआ कि मेरे पद या प्रतिष्ठा के कारण मेरे विचारों का अलग मूल्यांकन किया जा रहा हो। वे मेरी बात सुन रहे थे, प्रश्न पूछ रहे थे, विचार साझा कर रहे थे और मेरी लेखन प्रतिभा की मुक्त कंठ से प्रशंसा कर रहे थे।

फिर एक ऐसा प्रसंग हुआ, जिसे स्मरण करते हुए आज भी मन भावुक हो उठता है। महामहिम ने फोटोग्राफर को बुलाकर मेरे साथ तस्वीर खिंचवाने के लिए कहा। फिर उन्होंने फोटोग्राफर से कहा कि वह कविता की सुंदरता पर उनके विचारों का वीडियो बनाए।

फोटोग्राफर ने विनम्रतापूर्वक बताया कि वे केवल तस्वीरें खींच सकते हैं, वीडियो नहीं बना सकते। इस पर महामहिम ने तत्क्षण कहा — मेरा मोबाइल लेकर उसी से वीडियो बना लो।

यह केवल वीडियो बनवाने की बात नहीं थी। यह उस विराट संवेदनशीलता का प्रमाण था, जिसमें किसी दूसरे व्यक्ति की प्रसन्नता और भावना को सर्वोपरि रखा जाता है। राजभवन की सामान्य प्रक्रिया में केवल तस्वीरें भेजी जाती थीं। लेकिन महामहिम ने उसी दिन शाम को वह वीडियो भी मुझे भिजवा दी। आज वह वीडियो मेरे पास एक अमूल्य निधि के रूप में सुरक्षित है। चित्र में व्यक्ति दिखता है, पर वीडियो में उसकी आवाज, शब्द और भावनाएँ भी जीवित रहती हैं।

‘आत्मा के स्वर’ से ‘वातायन’ तक — जीवन संस्मरणों पर आधारित साहित्यिक यात्रा

उस भेंट में महामहिम ने मुझे अपनी दो पुस्तकें ‘आत्मा के स्वर’ भाग एक और भाग दो भेंट कीं। मैंने दोनों पुस्तकों को पढ़ा। किसी व्यक्ति के सार्वजनिक व्यवहार को देखना एक बात है, पर उसके विचारों के भीतर प्रवेश करना अलग अनुभव है।

उन पुस्तकों ने मेरे भीतर साहित्यिक अभिव्यक्ति के नए द्वार खोले। उन्हीं विचारों को मैंने काव्यात्मक रूप दिया और एक सुंदर एल्बम बनाकर भेंट किया।

इन्हीं अनुभवों, संवादों और उनके जीवन के प्रेरणादायी प्रसंगों से प्रेरित होकर मैंने लेफ्टिनेंट जनरल श्री गुरमीत सिंह जी के जीवन, उनके जीवन के संस्मरणों, उनके व्यक्तित्व और उनके दर्शन को आधार बनाकर अंग्रेजी कविताओं के माध्यम से ‘वातायन’ नामक पुस्तक प्रकाशित करवाई। यह पुस्तक विशेष रूप से महामहिम के जीवन के संस्मरणों, उनके अनुभवों और मानवीय मूल्यों पर आधारित है।

कभी-कभी कोई व्यक्ति स्वयं लेखक नहीं होता, पर उसका व्यक्तित्व दूसरे की लेखनी को नई दिशा दे देता है। मेरे लिए महामहिम ऐसे ही प्रेरणास्रोत रहे।

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ — सामाजिक कार्य को मिला संवेदनशील नेतृत्व

प्रधानाचार्य रहते हुए मैंने निर्धन बालिकाओं की शिक्षा में सहयोग का प्रयास किया। महामहिम ने मुझे राजभवन में आमंत्रित कर इस अभियान पर विस्तृत प्रस्तुति का अवसर दिया और मुझे सम्मानित किया। यह मेरे कार्य की नहीं, उस सामाजिक विचार की स्वीकृति थी। जब संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति ऐसे प्रयासों को पहचानता है, तो वह समाज को संदेश देता है कि सेवा ही सार्वजनिक जीवन की वास्तविक उपलब्धि है।

जब प्रोटोकॉल से ऊपर उठा परिवार का सम्मान

15 सितंबर 2024 का दिन मेरे लिए ऐसी ही एक अविस्मरणीय स्मृति है। अपने कार्यकाल का एक वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने मुझे आमंत्रित किया था। उन्होंने स्नेहपूर्वक कहा था कि मैं अपनी पत्नी को भी राजभवन लेकर आऊँ।

उनके इस स्नेहिल भाव से प्रसन्न होकर मैं अपनी पत्नी श्रीमती शारदा सैनी को साथ लेकर राजभवन पहुँचा। वहाँ अधिकारियों ने बताया कि मंच पर केवल मुझे बुलाया जाएगा।

पर मंच पर मिलते ही उन्होंने सबसे पहले पूछा — “क्या आपकी पत्नी नहीं आई हैं?” मैंने कहा — “जी, महामहिम, वे सामने बैठी हैं।” इसके बाद जो हुआ, वह सुखद आश्चर्य था। उन्होंने मंच से ही मेरी पत्नी को बुलाकर सम्मान दिया।

उस दिन हमारी नातिन भी साथ थी, जबकि छोटे बच्चों की अनुमति नहीं थी। उनकी धर्मपत्नी ने उस बच्ची को अपनी गोद में बिठा लिया। एक ओर राज्यपाल जी ने मेरी पत्नी को मंच पर बुलाकर सम्मान दिया, दूसरी ओर उनकी धर्मपत्नी ने हमारी नन्ही बच्ची को गोद में स्थान देकर अपनत्व दिया। नियम व्यवस्था चलाते हैं, पर संवेदना व्यवस्था को गरिमा देती है।

एक पिता की चिंता और राज्यपाल की महानता

महामहिम मेरे परिवार के विषय में भी पूछा करते थे। एक दिन मैंने बताया कि मेरे बेटे ने कंप्यूटर साइंस में बीटेक किया है और घर पर रोजगार की तलाश में है। एक पिता की चिंता स्वाभाविक है। उन्होंने इसे केवल सुना नहीं, बल्कि एक सप्ताह के भीतर अपने प्रयासों से मेरे बेटे को विश्वविद्यालय में अवसर दिलाया। मेरे लिए महत्त्व नौकरी का नहीं, इस भाव का था कि किसी ने मेरी चिंता को अपनी चिंता समझा। दूसरों का दुःख सुनना संवेदनशीलता है, पर उसे कम करने के लिए अपनी सामर्थ्य लगाना महानता है।

सेवानिवृत्ति पर न केवल शुभकामनाएँ, बल्कि सम्मान भी

मेरी सेवानिवृत्ति 31 अगस्त 2025 को थी। महामहिम ने मुझे 28 अगस्त 2025 को राजभवन आमंत्रित किया।

मेरी सेवानिवृत्ति पर उन्होंने राजभवन बुलाकर न केवल शुभकामनाएँ दीं, बल्कि मुझे स्मृति-चिह्न और उपहार देकर सम्मानित भी किया तथा सेवानिवृत्ति के पश्चात भी राष्ट्रहित में सक्रिय रहने का सुझाव दिया। उनके शब्दों में औपचारिक बधाई नहीं, बल्कि जीवन के अगले अध्याय को सार्थक बनाने की अपेक्षा थी।

मैंने उस समय अपनी अस्वस्थ माता जी की देखभाल के कारण कोई पद लेने में असमर्थता व्यक्त की, जिसे उन्होंने पूरी संवेदनशीलता से समझा और सम्मान दिया। संबंधों की सुंदरता इच्छा थोपने में नहीं, परिस्थिति समझने में होती है।

आज मैं राष्ट्रीय चरित्र निर्माण अभियान में निदेशक के रूप में राष्ट्रहित में कार्यरत हूँ। यह उसी प्रेरणा का विस्तार है।

दस बार सम्मान — उनके विशाल हृदय का प्रमाण

महामहिम ने अपने कार्यकाल में मुझे दस बार स्मृति-चिह्न और उपहार देकर सम्मानित किया। मैं इसे अपनी उपलब्धि नहीं, उनके विशाल हृदय, उदार दृष्टि और संभावना पहचानने की क्षमता का प्रमाण मानता हूँ। कुछ लोग स्वयं बड़े होकर दूसरों को छोटा कर देते हैं, पर कुछ इतने बड़े होते हैं कि दूसरों को भी सम्मान के शिखर तक पहुँचाने का प्रयास करते हैं।

‘वातायन’ का विमोचन — जीवन संस्मरणों को मिला राजकीय सम्मान

महामहिम के व्यक्तित्व और उनके जीवन संस्मरणों से प्रभावित होकर लिखी गई मेरी पुस्तक ‘वातायन’ के विषय में मैंने उन्हें अवगत कराया। 8 अगस्त 2026 को उन्होंने बताया कि 22 अगस्त 2026 को राजभवन में इस पुस्तक का विमोचन किया जाएगा।

22 अगस्त को प्रतिष्ठित अतिथियों की उपस्थिति में लेफ्टिनेंट जनरल श्री गुरमीत सिंह जी के जीवन संस्मरणों पर आधारित पुस्तक ‘वातायन’ का विमोचन हुआ। उस दिन मेरी बेटी डॉ. आयुषी सैनी ने पुस्तक और महामहिम के जीवन संस्मरणों पर प्रस्तुति दी, जिसे उन्होंने मंच पर सम्मानित कर साड़ी भेंट की। एक पिता के लिए इससे बड़ा क्षण क्या हो सकता है कि जिस व्यक्ति से वह प्रेरित हुआ हो, वही उसकी संतान की प्रतिभा को भी पहचाने।

राजभवन से लोक भवन तक

उनके कार्यकाल में राजभवन केवल संवैधानिक संस्था नहीं रहा, बल्कि संवाद, सम्मान और आत्मीयता का प्रतीक बन गया। लोगों ने उसे स्नेहपूर्वक ‘लोक भवन’ कहा। किसी भवन की दीवारें उसे राजभवन बनाती हैं, पर वहाँ का व्यवहार ही उसे जनता के हृदय में स्थान दिलाता है।

विदाई का दर्शन — पद समाप्त होता है, प्रभाव नहीं

आज जब अंतिम दिवस है, तब प्रश्न उठता है — क्या विदाई केवल औपचारिक प्रक्रिया है? क्या कार्यकाल समाप्त होने पर स्नेह का अध्याय भी समाप्त हो जाता है? मेरा अनुभव कहता है — नहीं।

पद समय के अधीन है। दायित्व आरंभ होते हैं और समाप्त भी होते हैं। पर व्यवहार का प्रभाव अमर होता है। शिक्षक सेवानिवृत्त हो सकता है, पर उसके संस्कार जीवित रहते हैं। लेखक चला जाता है, पर उसके विचार जीवित रहते हैं। उसी प्रकार राज्यपाल दायित्व से मुक्त हो सकता है, पर जिन हृदयों में उसने सम्मान का स्थान बनाया है, वहाँ से उसकी विदाई संभव नहीं। वास्तविक विदाई शरीर की उपस्थिति का अंत है, संबंधों की अनुभूति का नहीं।

आप जा रहे हैं, महामहिम… पर आपकी आत्मीयता यहीं रहेगी

आज उत्तराखंड की भावनाओं को शब्द देना आसान नहीं। जिन लोगों ने निकटता अनुभव की, उनके लिए यह केवल संवैधानिक पदाधिकारी की विदाई नहीं, उन आत्मीय संवादों की विदाई है, जिनमें उन्होंने अपनेपन की अनुभूति कराई।

मैंने उनकी प्रशंसा में कविताएँ लिखीं, उनके जीवन संस्मरणों को आधार बनाकर ‘वातायन’ की रचना की। पर आज लगता है कि मेरी लेखनी उनके व्यक्तित्व की विशालता का केवल एक छोटा अंश ही व्यक्त कर पाई है। किसी व्यक्ति की सबसे सुंदर जीवनी वही होती है, जो उसके जाने के बाद लोगों की स्मृतियों में लिखी जाती है। महामहिम की जीवनी के अनेक पृष्ठ उत्तराखंड के लोगों के हृदय में लिखे जा चुके हैं।

फूल मुरझा जाते हैं, पर सुगंध स्मृतियों में रहती है। दीपक बुझ जाता है, पर उसका प्रकाश दूसरे दीपक को प्रज्वलित करने की प्रेरणा देता है। वे यहाँ से जा रहे हैं, पर उन्होंने जो आत्मीयता दी, जो प्रेरणा दी, वे हमारे साथ रहेंगे।

मेरे लिए सबसे बड़ी स्मृति कोई स्मृति-चिह्न नहीं, वह अनुभूति है कि पद की ऊँचाई पर पहुँचकर भी मनुष्य विनम्र रह सकता है, अधिकार के साथ संवेदनशीलता जीवित रह सकती है।

महामहिम लेफ्टिनेंट जनरल श्री गुरमीत सिंह जी! आप राज्यपाल के रूप में आए थे, पर अपने व्यवहार से असंख्य हृदयों में अभिभावक का स्थान बना लिया। आपने सम्मान देकर केवल प्रसन्न नहीं किया, बल्कि कुछ अच्छा करने की प्रेरणा भी जगाई। आपने अपनी सरलता से सिद्ध किया कि महानता के लिए आडंबर नहीं चाहिए।

आज आप विदा हो रहे हैं। कल राजभवन के प्रांगण में वही दृश्य होंगे, वही पहाड़ होंगे, पर आपकी अनुपस्थिति एक रिक्तता छोड़ जाएगी। क्योंकि भवनों में रहने वाले बदल जाते हैं, पर कुछ व्यक्तित्व उन भवनों को ऐसी स्मृतियाँ दे जाते हैं, जो अनुपस्थिति में भी जीवित रहती हैं।

आपका जाना एक पद से विदाई है,
हमारे हृदयों से नहीं।
राजभवन में आपका कार्यकाल समाप्त हो रहा है,
लेकिन हमारी स्मृतियों में आपका स्नेह सदैव जीवित रहेगा।

पद की गरिमा से बढ़कर जिनका व्यवहार रहा,
अधिकार से अधिक जिनका आत्मीय प्यार रहा,
वे विदा होकर भी कहाँ विदा होते हैं,
जिनका स्नेह ही जीवन का सुंदर उपहार रहा।

By Mukesh Juyal

संपादक, आत्ममंथन जन मुद्दों का एक पक्षकार