देहरादून। चीन में आयोजित शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन (SCO) के सदस्य देशों के प्रकाशन सहयोग सम्मेलन में भारतीय भाषाओं, साहित्य और सांस्कृतिक संवाद की महत्वपूर्ण भूमिका पर विचार-विमर्श किया गया। सम्मेलन में भाग लेने वाली हिंदी अध्यापिका शैलजा तिवारी ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि पुस्तकों और अनुवाद के माध्यम से विभिन्न देशों के बीच आपसी समझ, सहयोग और सांस्कृतिक संबंधों को और अधिक मजबूत बनाया जा सकता है।

18 जून को बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव पब्लिशिंग कोऑपरेशन फोरम और शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन (SCO) सदस्य देशों के पब्लिशिंग कोऑपरेशन एसोसिएशन सम्मेलन का आयोजन चीन की राजधानी बीजिंग में किया गया। सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य सदस्य देशों के बीच प्रकाशन, साहित्य और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देना था।

यह आयोजन एससीओ की स्थापना के 25 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर रेनमिन विश्वविद्यालय में आयोजित किया गया। सम्मेलन की थीम “SCO बुक फॉरेस्ट” तथा मुख्य विषय “सभ्यताओं का पारस्परिक अनुवाद” रखा गया। वक्ताओं ने कहा कि बदलती वैश्विक परिस्थितियों में विभिन्न देशों के बीच संवाद, समझ और सहयोग पहले से अधिक आवश्यक हो गया है।

सम्मेलन में एससीओ सदस्य देशों के 30 से अधिक प्रकाशन संस्थानों और मीडिया संगठनों के प्रतिनिधियों सहित 100 से अधिक अतिथियों ने भाग लिया। विभिन्न देशों से आए विद्वानों, प्रकाशकों और शिक्षाविदों ने इस बात पर जोर दिया कि पुस्तकें और अनुवाद केवल ज्ञान के आदान-प्रदान का माध्यम नहीं हैं, बल्कि वे संस्कृतियों के बीच पुल का कार्य भी करते हैं।

रेनमिन यूनिवर्सिटी के अध्यक्ष मा हुईदेई ने अपने संबोधन में कहा कि प्रकाशन जगत ज्ञान के प्रसार, सभ्यताओं की विरासत को आगे बढ़ाने और लोगों के बीच आपसी समझ विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उन्होंने कहा कि पुस्तकों और अनुवादों के माध्यम से विभिन्न देशों के लोग एक-दूसरे के विचारों और अनुभवों को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं।

सम्मेलन में चीन में किर्गिस्तान के उपराजदूत अब्दुल्ला रहमान ने भी संबोधित किया। उन्होंने चीन और किर्गिस्तान के बीच सांस्कृतिक एवं शैक्षिक सहयोग की उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए कहा कि पुस्तकों और अनुवादों के माध्यम से दोनों देशों के लोग एक-दूसरे के इतिहास, संस्कृति और मूल्यों को बेहतर ढंग से समझ रहे हैं।

शैलजा तिवारी ने कहा कि एक हिंदी अध्यापिका के रूप में इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भाग लेना उनके लिए प्रेरणादायक अनुभव रहा। उन्होंने कहा कि हिंदी जैसी भाषाएं विभिन्न देशों के बीच सांस्कृतिक संवाद को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभा सकती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि चीन में भारतीय भाषा और संस्कृति के प्रति बढ़ती रुचि अनुवाद, साहित्य और शैक्षिक आदान-प्रदान के नए अवसर पैदा कर रही है।

उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि पुस्तकों और भाषाओं की शक्ति सीमाओं से परे जाकर देशों, संस्कृतियों और लोगों को जोड़ने का कार्य करती है। भविष्य में अनुवाद, प्रकाशन और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को और बढ़ावा देकर वैश्विक सहयोग को नई दिशा दी जा सकती है।

By Mukesh Juyal

संपादक, आत्ममंथन जन मुद्दों का एक पक्षकार