देहरादून/चकराता। चकराता वन प्रभाग के कालसी में तैनात उप प्रभागीय वनाधिकारी (एसडीओ) राजीव नयन नौटियाल के निलंबन को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। सामने आए आधिकारिक पत्र से यह स्पष्ट होता है कि जिस दिन की घटना को निलंबन का आधार बनाया गया, उस दिन एसडीओ अपने प्राथमिक दायित्व—मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने और जन सुरक्षा सुनिश्चित करने—के लिए मौके पर सक्रिय रूप से कार्य कर रहे थे।

17 जनवरी 2026 को जारी पत्र में एसडीओ ने स्पष्ट किया है कि 5 जनवरी 2026 को कालसी तहसील के के पजिटीलानी गांव में आयोजित ‘जन-जन की सरकार, जन-जन के द्वार’ बहुउद्देश्यीय शिविर में वह निर्धारित समय पर शामिल नहीं हो सके, क्योंकि उन्हें कनासर रेंज में मानव-वन्यजीव संघर्ष की गंभीर सूचना मिली थी। पत्र के अनुसार, एक व्यक्ति पर जंगली जानवर (भालू) के हमले की सूचना मिलने के बाद वह तत्काल मौके पर पहुंचे और स्थिति की गंभीरता को देखते हुए आवश्यक कार्रवाई में जुट गए।

एसडीओ ने अपने स्पष्टीकरण में कहा है कि वन विभाग का प्रथम दायित्व मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं को नियंत्रित करना, जनहानि रोकना और प्रभावित क्षेत्रों में लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। उन्होंने बताया कि क्षेत्र में लगातार वन्यजीव गतिविधियों और जनहानि की आशंकाओं के मद्देनजर उनकी उपस्थिति अत्यंत आवश्यक थी।

अब सवाल यह उठ रहा है कि जब संबंधित अधिकारी अपने विभागीय दायित्वों और जन सुरक्षा के लिए मैदान में सक्रिय थे, तब उसी घटना को उनके निलंबन का आधार कैसे बनाया गया। इस मामले ने वन विभाग की कार्यप्रणाली और अधिकारियों के प्रति अपनाए जा रहे रवैये पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

सूत्रों के अनुसार, एसडीओ के समर्थन में यह तर्क भी सामने आ रहा है कि दुर्गम क्षेत्रों में कार्यरत वन अधिकारियों को अक्सर प्रशासनिक कार्यक्रमों और आपातकालीन वन्यजीव परिस्थितियों के बीच संतुलन बनाना पड़ता है। ऐसे में मानव जीवन की सुरक्षा को प्राथमिकता देना उनका संवैधानिक और विभागीय दायित्व है।

यह मामला अब महज एक निलंबन का नहीं, बल्कि उन परिस्थितियों में कर्तव्य निभाने वाले अधिकारियों के निर्णयों के मूल्यांकन का भी बन गया है, जो प्रतिदिन मानव-वन्यजीव संघर्ष जैसी चुनौतीपूर्ण स्थितियों से जूझते हैं।

By Mukesh Juyal

संपादक, आत्ममंथन जन मुद्दों का एक पक्षकार